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परक्राम्य लिखत अधिनियम 1881 • धारा 138 वैधानिक नोटिस प्रारूप (2026 अपडेटेड)

चेक बाउंस नोटिस फॉर्मेट हिंदी में — धारा 138 के अनुसार

धारा 138 के तहत चेक बाउंस का कानूनी नोटिस हिंदी में: पूरा फॉर्मेट, समय सीमा और भेजने का सही तरीका।

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त्वरित कानूनी उत्तर: बैंक मेमो (Bank Return Memo) मिलने के ठीक 30 दिनों के भीतर धारा 138(b) के तहत देनदार को 15-दिवसीय कानूनी मांग नोटिस भेजना वैधानिक रूप से अनिवार्य है। नोटिस रजिस्टर्ड स्पीड पोस्ट द्वारा सही पते पर भेजा जाना चाहिए। यदि देनदार 15 दिन में चेक राशि नहीं चुकाता, तो अगले 30 दिन में सक्षम मजिस्ट्रेट न्यायालय में आपराधिक परिवाद दायर कर 2 वर्ष तक का कारावास व चेक राशि का दोगुना जुर्माना कराया जा सकता है।

📋 चेक बाउंस कानूनी नोटिस: मुख्य वैधानिक मानक (Key Statutory Facts)

NI Act, 1881
लागू कानून व धाराएंपरक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 138, 141 (कंपनी व निदेशक), 142 एवं 143A (20% अंतरिम मुआवजा)
नोटिस भेजने की समय सीमाबैंक वापसी मेमो (Bank Memo) प्राप्त होने की तिथि से ठीक 30 दिन (अनिवार्य समय सीमा)
देनदार को भुगतान की मोहलतनोटिस प्राप्ति (Delivery) की तिथि से 15 दिन (Cure Period — धारा 138(c))
भेजने का मान्य माध्यमरजिस्टर्ड स्पीड पोस्ट (Speed Post AD) + ईमेल / व्हाट्सएप (धारा 63 बीएसए 2023 इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य)
अदालती फोरम (केस दायर करने की जगह)धारा 142(2) के अनुसार शिकायतकर्ता (Payee) का बैंक खाता जिस न्यायालय के क्षेत्राधिकार में आता है (JMFC / MM कोर्ट)
सजा व जुर्माने का प्रावधान2 वर्ष तक का कारावास अथवा चेक राशि का दोगुना (2x) तक आर्थिक जुर्माना अथवा दोनों
LegalRecovery सेवा शुल्कफ्लैट ₹999 (वकील ड्राफ्टिंग + स्पीड पोस्ट डिस्पैच + ट्रैकिंग पावती)

चेक बाउंस नोटिस क्या है और इसे भेजना क्यों अनिवार्य है?

भारतीय वाणिज्यिक कानून में किसी भी व्यक्ति या फर्म द्वारा दिया गया चेक जब बैंक द्वारा अपर्याप्त बैलेंस (Funds Insufficient), खाता बंद (Account Closed), या भुगतान रोकने (Stop Payment) जैसे कारणों से अनादरित (Dishonour) कर दिया जाता है, तो यह केवल एक दीवानी मामला नहीं रहता, बल्कि परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के तहत एक संज्ञेय अपराध बन जाता है।

किंतु बैंक से चेक बाउंस होने मात्र से आप सीधे कोर्ट में केस दर्ज नहीं कर सकते। भारतीय संसद ने कानून में चेक जारीकर्ता (Drawer) को एक अंतिम वैधानिक अवसर प्रदान किया है। कानून के अनुसार शिकायतकर्ता को बैंक मेमो प्राप्त होने के 30 दिनों के भीतर देनदार को एक औपचारिक 15-दिवसीय विधिक मांग नोटिस (Demand Notice) भेजना अनिवार्य है।

⚠️ ध्यान दें: यदि 30 दिन में नोटिस नहीं भेजा तो क्या होगा?

यदि आप बैंक वापसी मेमो की तारीख से 30 दिन के भीतर विधिक नोटिस भेजने से चूक जाते हैं, तो आप धारा 138 का विशेष आपराधिक केस दायर करने का मूल अधिकार खो देंगे। इसके बाद आपके पास केवल 3 वर्ष की मियाद में सिविल कोर्ट में रिकवरी सूट (दीवानी वसूली वाद या Order 37 Summary Suit) दाखिल करने का विकल्प रह जाएगा, जिसमें अदालती समय अधिक लगता है।

धारा 138 एनआई एक्ट: नोटिस की 4 अनिवार्य कानूनी शर्तें

अदालत में केस टिकने के लिए कानूनी नोटिस में निम्नलिखित चार तत्वों का होना अनिवार्य है। यदि इनमें से एक भी तत्व छूट जाता है, तो अभियुक्त नोटिस को तकनीकी आधार पर निरस्त करवा सकता है:

नियम 1

वैध ऋण या देनदारी (Legally Enforceable Debt)

चेक किसी उपहार, दान या गैर-कानूनी कार्य (जैसे सट्टा) के लिए नहीं, बल्कि किसी वैध व्यापार, उधारी या अनुबंध के प्रतिफल स्वरूप जारी किया गया होना चाहिए।

नियम 2

वैधता अवधि में बैंक में प्रस्तुति (Presentation within 3 Months)

चेक को उसकी जारी तिथि से 3 महीने की आधिकारिक वैधता अवधि के भीतर निकासी हेतु बैंक में प्रस्तुत किया गया होना चाहिए।

नियम 3

30 दिन का नोटिस नियम (Section 138 Proviso b)

बैंक मेमो की प्राप्ति तिथि से ठीक 30 दिनों के भीतर लिखित नोटिस भेजा जाना चाहिए। विस्तृत 30-दिवसीय समय सीमा गाइड यहाँ देखें।

नियम 4

15 दिन की भुगतान मोहलत (15 Days Cure Window)

नोटिस में देनदार को नोटिस मिलने से स्पष्ट 15 दिनों के भीतर पूरी चेक राशि चुकाने की मांग की जानी चाहिए। 15 दिन पूरे होने से पूर्व कोर्ट में परिवाद दाखिल नहीं हो सकता।

लाइव लीगल नोटिस जनरेटर • धारा 138 NI Act

चेक बाउंस कानूनी नोटिस फॉर्मेट (हिंदी) — कस्टमाइज़ व डाउनलोड करें

अपनी जानकारी (नाम, चेक नंबर, राशि, बैंक मेमो दिनांक) भरें। नीचे नोटिस तुरंत लाइव अपडेट होगा। आप इसे कॉपी, प्रिंट अथवा टेक्स्ट/वर्ड फ़ाइल के रूप में सुरक्षित कर सकते हैं।

जानकारी प्रविष्ट करें (विवरण भरें)सभी फ़ील्ड्स लाइव अपडेट होते हैं

1. अधिवक्ता का विवरण
2. चेक धारक / शिकायतकर्ता (Payee)
3. चेक जारीकर्ता / देनदार (Drawer)
4. चेक व बैंक मेमो विवरण (अनिवार्य)
लाइव लीगल नोटिस प्रीव्यू
पंजीकृत स्पीड पोस्ट (AD) एवं ईमेल द्वारा वैधानिक कानूनी मांग नोटिस (परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 138 के अंतर्गत / Section 138 NI Act) कार्यालय: राजेश कुमार शर्मा (एडवोकेट) अधिवक्ता, बार काउंसिल नामांकन संख्या: D/1428/2014 कार्यालय पता: चेम्बर नं. 412, लॉयर्स ब्लॉक, तीस हजारी कोर्ट परिसर, दिल्ली - 110054 दिनांक: 4 नवम्बर 2026 स्थान: नई दिल्ली (New Delhi) सेवा में, 1. श्री सुरेश कुमार वर्मा आत्मज: श्री बनवारी लाल वर्मा पता: प्लॉट नं. 12, ब्लॉक-बी, सेक्टर 62, नोएडा, गौतम बुद्ध नगर, उत्तर प्रदेश - 201301 मोबाइल/संपर्क: 9123456789 / defaulter@email.com महोदय, मेरे मुवक्किल (Client) श्री महेश चंद्र गुप्ता, आत्मज स्व. श्री रामस्वरूप गुप्ता, निवासी: मकान नं. 54, विकास मार्ग, शकरपुर, दिल्ली - 110092 के स्पष्ट निर्देशों और प्राधिकार के अधीन, मैं आपको निम्नलिखित वैधानिक कानूनी नोटिस प्रेषित करता हूँ: 1. यह कि आप और मेरे मुवक्किल के मध्य पूर्व व्यावसायिक/व्यक्तिगत संबंध रहे हैं। आपने मेरे मुवक्किल से व्यावसायिक माल आपूर्ति व वैध वैधानिक देनदारी (Legally Enforceable Debt) के एवज में वित्तीय सहायता/उधार प्राप्त किया था, जिसके पूर्ण एवं अंतिम निपटान हेतु आप पर मेरे मुवक्किल का कुल वैध एवं विधिक ऋण बकाया था। 2. यह कि उपरोक्त वैध देनदारी एवं ऋण (Legally Enforceable Debt and Liability) के भुगतान के उद्देश्य से आपने मेरे मुवक्किल के पक्ष में निम्नलिखित चेक जारी किया था: - चेक संख्या: 458921 - चेक दिनांक: 15 अक्टूबर 2026 - राशि: ₹4,50,000 (अक्षरों में: चार लाख पचास हजार रुपये मात्र) - देय बैंक एवं शाखा: भारतीय स्टेट बैंक (State Bank of India), सेक्टर 62 शाखा, नोएडा 3. यह कि आपके द्वारा दिए गए विश्वास एवं आश्वासन पर मेरे मुवक्किल ने उक्त चेक को अपने बैंक खाते में दिनांक 20 अक्टूबर 2026 को निकासी (Clearance) हेतु प्रस्तुत किया। 4. यह कि मेरे मुवक्किल को उस समय गहरा मानसिक आघात लगा जब संबंधित बैंक द्वारा दिनांक 22 अक्टूबर 2026 को एक बैंक वापसी ज्ञापन (Bank Return Memo) के साथ उक्त चेक अनादरित (Dishonoured) कर वापस लौटा दिया गया। बैंक वापसी मेमो में चेक बाउंस होने का अधिकृत कारण अंकित था: "Funds Insufficient / खाते में अपर्याप्त निधि"। 5. यह कि आपने दुर्भावनापूर्ण इरादे से, यह भली-भांति जानते हुए कि आपके खाते में पर्याप्त धनराशि नहीं है, मेरे मुवक्किल को गुमराह करने और धोखाधड़ी के उद्देश्य से यह चेक जारी किया था। आपका यह कृत्य परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 138 के तहत एक संज्ञेय एवं दंडनीय अपराध है। 6. अतः इस वैधानिक कानूनी नोटिस के माध्यम से आपको सूचित किया जाता है कि इस नोटिस की प्राप्ति के ठीक 15 (पंद्रह) दिनों के भीतर उक्त चेक राशि ₹4,50,000 (चार लाख पचास हजार रुपये मात्र) का भुगतान मेरे मुवक्किल को सीधे उनके बैंक खाते में आरटीजीएस/एनईएफटी या डिमांड ड्राफ्ट के माध्यम से सुनिश्चित करें। 7. चेतावनी: यदि आप उक्त वैधानिक अवधि (15 दिन) के भीतर संपूर्ण चेक राशि का भुगतान करने में विफल रहते हैं, तो मेरे मुवक्किल आपके विरुद्ध परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 138/142 के तहत सक्षम मजिस्ट्रेट न्यायालय में आपराधिक परिवाद (Criminal Complaint) दायर करने को बाध्य होंगे, जिसमें आपको 2 वर्ष तक का सश्रम कारावास तथा चेक राशि का दोगुना जुर्माना हो सकता है। साथ ही धारा 143A के तहत 20% तक अंतरिम मुआवजा (Interim Compensation) एवं दीवानी प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 37 के तहत वसूली वाद भी दायर किया जाएगा, जिसके समस्त हर्जाने-खर्चे व अदालती व्यय के उत्तरदायी आप स्वयं होंगे। नोटिस की एक प्रति मेरे कार्यालय में भविष्य के अदालती उपयोग हेतु सुरक्षित रखी गई है। भवदीय, (राजेश कुमार शर्मा (एडवोकेट)) अधिवक्ता, बार काउंसिल: D/1428/2014 हस्ताक्षर मुवक्किल: _____________________ (महेश चंद्र गुप्ता)
⚠️ यह प्रारूप एनआई एक्ट की धारा 138(b) के अनिवार्य 30 दिवसीय नोटिस नियम का पूर्ण अनुपालन करता है।Section 138 / 141 Compliant

चेक बाउंस नोटिस के प्रत्येक पैराग्राफ (क्लॉज) का कानूनी महत्व

अदालत में जब आपका वकील केस पेश करता है, तो मजिस्ट्रेट सबसे पहले नोटिस के पैराग्राफ्स का परीक्षण करते हैं। जानिए नोटिस में प्रत्येक बात क्यों लिखी जाती है:

1. व्यावसायिक संबंध एवं वैध दायित्व का उल्लेख (Legally Enforceable Debt)

परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 139 के तहत चेक धारक के पक्ष में यह कानूनी उपधारणा होती है कि चेक किसी वैध ऋण के लिए दिया गया था। नोटिस में लेनदेन का संक्षिप्त संदर्भ देना आवश्यक है ताकि देनदार बाद में अदालत में यह झूठा बहाना न बना सके कि चेक खो गया था या सुरक्षा हेतु कोरा (Blank Security Cheque) दिया गया था।

2. चेक नंबर, दिनांक, बैंक शाखा एवं सटीक राशि का विवरण

सुप्रीम कोर्ट के सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया बनाम सैक्सन फार्म्स (1999) फैसले के अनुसार, नोटिस में चेक की मूल राशि का स्पष्ट और असंदिग्ध उल्लेख होना चाहिए। यदि चेक ₹4,50,000 का है तो नोटिस में यह राशि अंकों व शब्दों में दर्ज होनी चाहिए।

3. बैंक वापसी ज्ञापन (Bank Return Memo) की तारीख व कारण

चेक कब बैंक में लगाया गया और किस तारीख को किस कारण (जैसे 'Funds Insufficient', 'Stop Payment', या 'Signature Mismatch') से बाउंस हुआ, यह लिखना अनिवार्य है। 30 दिन की गणना इसी बैंक मेमो की तारीख से शुरू होती है।

4. धारा 141 का उल्लेख (कंपनी एवं निदेशकों के मामले में)

यदि चेक किसी कंपनी, एलएलपी या पार्टनरशिप फर्म का है, तो नोटिस में स्पष्ट लिखा होना चाहिए कि उक्त निदेशक या पार्टनर उस समय कंपनी के कार्य संचालन के लिए सीधे जिम्मेदार थे। कंपनी निदेशकों पर धारा 141 दायित्व का पूरा कानून यहाँ पढ़ें।

5. धारा 143A के तहत 20% अंतरिम मुआवजा की चेतावनी

2018 के संशोधन द्वारा जोड़ी गई धारा 143A मजिस्ट्रेट को यह शक्ति देती है कि समन जारी होने और आरोप तय होने पर वह आरोपी देनदार को चेक राशि का 20% तक अंतरिम मुआवजा तुरंत शिकायतकर्ता को जमा कराने का आदेश दे सकती है। नोटिस में इस प्रावधान का उल्लेख करने से देनदार पर तत्काल मनोवैज्ञानिक दबाव बनता है।

चेक बाउंस वैधानिक समय सीमा चार्ट (Section 138 Statutory Timeline)

चेक बाउंस की प्रक्रिया पूरी तरह समय-बद्ध (Time-Bound) है। एक दिन की भी देरी से आपका केस खारिज हो सकता है:

01चेक बाउंस मेमोबैंक द्वारा चेक अनादरदिन 0 (Day 0)02लीगल नोटिस प्रेषणस्पीड पोस्ट + ईमेल द्वारा30 दिनों के भीतर0315 दिन भुगतान मोहलतनोटिस प्राप्ति से गणना15 दिन का समय04मजिस्ट्रेट कोर्ट परिवादधारा 142 के तहत केसअगले 30 दिनों में
💡 तारीखों की सही गणना के लिए हमारे चेक बाउंस डेडलाइन कैलकुलेटर टूल का उपयोग करें।सुप्रीम कोर्ट दिशानिर्देश 2026

चेक बाउंस का कानूनी नोटिस भेजने का सही तरीका (Step-by-Step)

नोटिस ड्राफ्ट करना आधा काम है; उसे कानूनन सही तरीके से प्रेषित और रिकॉर्ड करना सबसे महत्वपूर्ण है। अदालत में केस साबित करने के लिए नीचे दिए गए 4 चरणों का पालन करें:

  1. पंजीकृत स्पीड पोस्ट (Registered Speed Post with AD): नोटिस की हस्ताक्षरित मूल प्रति डाकघर जाकर केवल स्पीड पोस्ट से ही भेजें। साधारण डाक (Ordinary Post) कभी न भेजें क्योंकि साधारण डाक की कोई ट्रैकिंग या डिलीवरी रसीद नहीं होती।
  2. डाक रसीद (Postal Receipt) संभाल कर रखें: स्पीड पोस्ट काउंटर से मिलने वाली बारकोड रसीद को सुरक्षित चिपका कर रखें। यह रसीद कोर्ट में दाखिल होने वाले शपथ-पत्र का अनिवार्य हिस्सा होती है।
  3. इंडिया पोस्ट वेबसाइट से ट्रैकिंग रिपोर्ट डाउनलोड करें: नोटिस पोस्ट करने के 4–5 दिन बाद indiapost.gov.in पर जाकर कंसाइनमेंट नंबर डालकर डिलीवरी स्टेटस (Delivered, Refused, या Unclaimed) का प्रिंटआउट निकाल लें।
  4. ईमेल और व्हाट्सएप पर इलेक्ट्रॉनिक तामील (BSA धारा 63): नोटिस की पीडीएफ प्रति देनदार की ईमेल आईडी और व्हाट्सएप पर भेजें तथा डिलीवरी टिक का स्क्रीनशॉट लें। भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 की धारा 63 के तहत इलेक्ट्रॉनिक नोटिस को कोर्ट में त्वरित मान्यता प्राप्त है।

केस स्टडी / व्यावहारिक उदाहरण (Worked Example)

समझिए कि वास्तविक जीवन में तारीखों और नोटिस की गणना कैसे की जाती है (उदाहरणात्मक केस):

पक्षकार:रमेश (लेनदार) बनाम संजय (देनदार)
चेक विवरण:चेक सं. 304812, राशि ₹3,50,000, दिनांक 10 अक्टूबर 2026
बैंक में प्रस्तुति:14 अक्टूबर 2026 (एसबीआई शाखा)
बैंक वापसी मेमो प्राप्त:16 अक्टूबर 2026 (कारण: खाते में अपर्याप्त निधि)
नोटिस भेजने की अंतिम तारीख (30 दिन):15 नवम्बर 2026 (रमेश ने 20 अक्टूबर को नोटिस भेज दिया)
देनदार को नोटिस डिलीवरी:23 अक्टूबर 2026 (स्पीड पोस्ट ट्रैकिंग अनुसार)
15-दिवसीय भुगतान अवधि (Cure Period):24 अक्टूबर 2026 से 07 नवम्बर 2026 तक
कोर्ट में केस दाखिल करने की विंडो:08 नवम्बर 2026 से 07 दिसम्बर 2026 (30 दिन)

सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण कानूनी फैसले (Landmark Precedents)

भारतीय अदालतों में चेक बाउंस नोटिस की वैधता पर स्थापित 4 प्रमुख न्यायिक नजीरें:

(2007) 6 SCC 555 / 2007 AIR SCW 3214निर्णय दिनांक 18 मई 2007

सुप्रीम कोर्ट (3-जज बेंच) — स्पीड पोस्ट से भेजे गए नोटिस पर तामील (Service) की वैधानिक उपधारणा

C.C. Alavi Haji v. Palapetty Muhammed & Anr.

मामले के तथ्य: देनदार को चेक बाउंस होने के बाद सही पते पर पंजीकृत स्पीड पोस्ट द्वारा धारा 138 का नोटिस भेजा गया था। डाक लिफाफा 'Unclaimed' (अस्वीकृत / दावा न किया गया) टीप के साथ वापस आ गया। देनदार ने मजिस्ट्रेट अदालत में तर्क दिया कि नोटिस वास्तव में प्राप्त नहीं हुआ था, इसलिए धारा 138 के तहत अपराध नहीं बनता।

न्यायालय का आदेश: सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय संविधान पीठ ने ऐतिहासिक निर्णय देते हुए स्पष्ट किया कि जनरल क्लॉजेज एक्ट की धारा 27 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (वर्तमान बीएसए धारा 24/63) के तहत यदि सही पते पर प्री-पेड पंजीकृत डाक से नोटिस भेजा गया है, तो उसे विधिक रूप से 'तामील' (Deemed Service) माना जाएगा। कोई भी चालाक देनदार डाक लेने से मना करके या जानबूझकर घर बंद रखकर धारा 138 की आपराधिक प्रक्रिया से बच नहीं सकता।

मुख्य कानूनी सबक: चेक बाउंस नोटिस हमेशा सही पते पर रजिस्टर्ड स्पीड पोस्ट द्वारा भेजें और इंडिया पोस्ट की डिलीवरी/ट्रैकिंग रसीद सुरक्षित रखें। यदि देनदार लिफाफा लेने से इनकार करता है, तब भी कानूनन नोटिस तामील माना जाता है।
(1999) 8 SCC 221 / AIR 1999 SC 3607निर्णय दिनांक 01 अक्टूबर 1999

सुप्रीम कोर्ट — धारा 138(b) के तहत केवल विशिष्ट चेक राशि की ही स्पष्ट मांग की जानी चाहिए

Central Bank of India & Anr. v. Saxons Farms & Ors.

मामले के तथ्य: देनदार द्वारा जारी किए गए चेक बाउंस होने पर बैंक ने नोटिस भेजा जिसमें चेक राशि के अलावा अन्य ब्याज, वकील शुल्क और दंडात्मक नुकसान की राशि का अस्पष्ट ब्योरा जोड़कर एकमुश्त बड़ी राशि की मांग की गई थी। अभियुक्त ने तर्क दिया कि नोटिस में चेक की विशिष्ट राशि की मांग अलग से नहीं की गई थी, अतः नोटिस अमान्य है।

न्यायालय का आदेश: सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि धारा 138 के परंतुक (b) का मूल उद्देश्य देनदार को चेक की सही और निश्चित राशि चुकाने के लिए 15 दिन का अवसर देना है। यद्यपि नोटिस में वकील शुल्क या ब्याज का उल्लेख किया जा सकता है, किंतु चेक की मूल राशि की मांग स्पष्ट और पृथक रूप से होनी चाहिए ताकि देनदार 15 दिन में केवल चेक राशि देकर आपराधिक दायित्व से मुक्त हो सके।

मुख्य कानूनी सबक: नोटिस के ड्राफ्ट में चेक की सही राशि, चेक नंबर और बैंक मेमो का विवरण स्पष्ट लिखें। अतिरिक्त ब्याज या लीगल फीस का उल्लेख करते हुए भी मूल चेक राशि को स्पष्ट रखें।
(2009) 1 SCC 69 / AIR 2009 SC 1011निर्णय दिनांक 07 नवम्बर 2008

सुप्रीम कोर्ट — चेक बाउंस केस और दीवानी वसूली सूट दोनों एक साथ चलाए जा सकते हैं

Sri Krishna Agencies v. State of Andhra Pradesh & Anr.

मामले के तथ्य: क्रेडिटर ने ₹11 लाख के अनादरित चेक के लिए धारा 138 का क्रिमिनल नोटिस भेजकर कोर्ट में केस दायर किया। साथ ही पैसे की वसूली हेतु सिविल कोर्ट में रिकवरी सूट भी दाखिल किया। आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने सिविल सूट लंबित होने के आधार पर आपराधिक कार्यवाही निरस्त कर दी थी।

न्यायालय का आदेश: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि धारा 138 की आपराधिक कार्यवाही और सिविल वसूली का दावा (दीवानी प्रक्रिया संहिता का आदेश 37) दोनों अलग-अलग क्षेत्रों में कार्य करते हैं। दीवानी सूट का लंबित होना धारा 138 के आपराधिक परिवाद को नहीं रोकता। दोनों प्रक्रियाएं समानांतर चल सकती हैं।

मुख्य कानूनी सबक: 15 दिन का नोटिस बीतने पर आप मजिस्ट्रेट कोर्ट में 138 का आपराधिक केस दर्ज करने के साथ-साथ सिविल कोर्ट में समरी सूट भी दाखिल कर सकते हैं।
(2005) 8 SCC 89 / AIR 2005 SC 4366निर्णय दिनांक 20 सितम्बर 2005

कंपनी द्वारा चेक बाउंस होने पर निदेशक का दायित्व एवं धारा 141 का अनिवार्य नोटिस

SMS Pharmaceuticals Ltd. v. Neeta Bhalla & Anr.

मामले के तथ्य: एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी द्वारा जारी चेक बाउंस हो गया था। शिकायतकर्ता ने कंपनी के सभी निदेशकों को बिना उनकी विशिष्ट भूमिका का उल्लेख किए नोटिस भेजा और आरोपी बना दिया।

न्यायालय का आदेश: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 141 के तहत आपराधिक दायित्व के लिए नोटिस और शिकायत में यह विशिष्ट कथन होना अनिवार्य है कि संबंधित निदेशक अपराध के समय कंपनी के कार्य संचालन एवं व्यवसाय के लिए सीधे तौर पर उत्तरदायी और प्रभारी (In-charge and Responsible) था। हस्ताक्षरकर्ता प्रबंध निदेशक (MD) पर दायित्व स्वतः सिद्ध होता है।

मुख्य कानूनी सबक: यदि चेक किसी कंपनी या पार्टनरशिप फर्म का है, तो नोटिस कंपनी के पंजीकृत पते पर तथा चेक पर हस्ताक्षर करने वाले सक्रिय निदेशक को उनके नाम व पद सहित प्रेषित करें।

चेक बाउंस नोटिस व केस के लिए आवश्यक सबूतों की चेकलिस्ट

नोटिस भेजने से पहले यह सुनिश्चित करें कि आपके पास निम्नलिखित 6 प्राथमिक दस्तावेज़ सुरक्षित हैं:

✓मूल चेक (Original Dishonoured Cheque): दोनों तरफ की साफ फोटोकॉपी भी रख लें।
✓बैंक रिटर्न मेमो (Bank Memo): बैंक की सील और चेक बाउंस का आधिकारिक कारण अंकित होना चाहिए।
✓ऋण/लेनदेन का सबूत: बैंक स्टेटमेंट (Bank UTR), इनवॉइस, या प्रोमिसरी नोट (Promissory Note)।
✓डाक रसीद (Speed Post Receipt): डाकघर से प्राप्त मूल रसीद कंसाइनमेंट नंबर सहित।
✓ऑनलाइन ट्रैकिंग रिपोर्ट: इंडिया पोस्ट से डाउनलोड की गई डिलीवरी या अस्वीकृति की प्रमाणित रिपोर्ट।
✓धारा 63 BSA इलेक्ट्रॉनिक प्रमाणपत्र: ईमेल या व्हाट्सएप डिलीवरी हेतु वैधानिक शपथ-पत्र।

यदि देनदार 15 दिनों में पैसा न दे तो आगे क्या कानूनी कदम उठाएं?

यदि 15 दिन बीत जाने के बाद भी चेक जारीकर्ता भुगतान नहीं करता है, तो आप तुरंत निम्नलिखित कानूनी कदम उठा सकते हैं:

1. मजिस्ट्रेट कोर्ट में धारा 138 का आपराधिक परिवाद (Criminal Complaint)

15 दिन पूरे होने के अगले 30 दिनों के भीतर न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) या सीएमएम कोर्ट में आपराधिक केस दायर करें। कोर्ट आरोपी को समन जारी करेगी। पेश न होने पर जमानती और गैर-जमानती वारंट जारी किए जाते हैं।

2. धारा 143A के तहत 20% अंतरिम मुआवजा आवेदन

केस की पहली पेशी या आरोप तय होते ही आपके वकील धारा 143A के तहत आवेदन लगाते हैं, जिससे अदालत देनदार को 60 दिनों में चेक राशि का 20% आपको सीधे अदा करने का आदेश देती है।

3. सिविल कोर्ट में समरी सूट (Order 37 CPC Money Recovery)

आप आपराधिक केस के साथ-साथ दीवानी अदालत में समानांतर सिविल वसूली वाद भी दायर कर सकते हैं। ऑर्डर 37 के तहत देनदार की संपत्तियों की कुर्की (Attachment Before Judgment) कराई जा सकती है।

धारा 138 एनआई एक्ट • सुप्रीम कोर्ट दिशानिर्देश 2026 अनुसार

चेक बाउंस होने पर कानूनी नोटिस भेजने में देरी न करें

बैंक मेमो मिलने के 30 दिनों के भीतर कानूनी नोटिस भेजना अनिवार्य है। LegalRecovery के विशेषज्ञ अधिवक्ताओं द्वारा 24 घंटे में वैधानिक मांग नोटिस तैयार करवाएं, स्पीड पोस्ट द्वारा ट्रैकिंग पावती (AD) सहित भेजें और ईमेल/व्हाट्सएप पर धारा 63 बीएसए (BSA 2023) के तहत इलेक्ट्रॉनिक प्रमाण दर्ज करें।

✓ 24 घंटे में ड्राफ्ट•✓ स्पीड पोस्ट + ट्रैकिंग•✓ केवल ₹999

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (Frequently Asked Questions)

चेक बाउंस होने के कितने दिनों के भीतर कानूनी नोटिस भेजना अनिवार्य है?

परक्राम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act, 1881) की धारा 138 के परंतुक (b) के अनुसार, जिस दिन आपको अपने बैंक से चेक बाउंस होने का अधिकृत ज्ञापन (Bank Return Memo) प्राप्त होता है, उस दिनांक से ठीक 30 दिनों के भीतर देनदार को लिखित कानूनी नोटिस भेजना अनिवार्य है। यदि 30 दिन का समय बीत जाता है, तो धारा 138 के तहत आपराधिक मुकदमा दर्ज कराने का वैधानिक अधिकार समाप्त हो जाता है (केवल धारा 142 के तहत देरी माफी के विशेष आवेदन पर अदालत के विवेक पर निर्भर रहना पड़ता है)।

चेक बाउंस नोटिस में देनदार को भुगतान के लिए कितने दिनों का समय दिया जाता है?

धारा 138(c) के तहत देनदार को कानूनी नोटिस की प्राप्ति (Receipt) की तिथि से अनिवार्य रूप से 15 दिनों का भुगतान समय (Cure Period) दिया जाना चाहिए। नोटिस मिलने के 15 दिन पूरे होने से पहले कोर्ट में केस दाखिल नहीं किया जा सकता। यदि देनदार इन 15 दिनों में चेक की राशि चुका देता है, तो कोई आपराधिक अपराध नहीं बनता। यदि 15 दिन बीतने के बाद भी भुगतान नहीं होता, तो 16वें दिन से अपराध घटित हो जाता है।

चेक बाउंस का कानूनी नोटिस वकील के माध्यम से भेजना जरूरी है या स्वयं भी भेज सकते हैं?

कानूनन आप स्वयं अपने हस्ताक्षर से भी 15 दिवसीय मांग नोटिस (Statutory Demand Notice) भेज सकते हैं। हालांकि, व्यावहारिक रूप से किसी अनुभवी अधिवक्ता (Advocate) के लेटरहेड और वकालतनामा/अधिसूचना के माध्यम से नोटिस भेजना अत्यधिक प्रभावी होता है। वकील द्वारा ड्राफ्ट किए गए नोटिस में धारा 138, धारा 141 (कंपनियों के मामले में), सुप्रीम कोर्ट के नजीरें तथा धारा 143A के तहत 20% अंतरिम मुआवजे की वैधानिक चेतावनी का सटीक उल्लेख होता है, जिससे 70% से अधिक मामलों में देनदार मुकदमे के डर से बिना कोर्ट जाए तुरंत भुगतान कर देता है।

चेक बाउंस कानूनी नोटिस भेजने का सही तरीका क्या है (स्पीड पोस्ट या ईमेल)?

चेक बाउंस का कानूनी नोटिस हमेशा पंजीकृत स्पीड पोस्ट (Registered Speed Post with Acknowledgment Due - AD) द्वारा देनदार के सही आवासीय या आधिकारिक पते पर भेजा जाना चाहिए। इसके साथ ही भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023) की धारा 63 के तहत इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य तैयार करने के लिए नोटिस की पीडीएफ प्रति देनदार के आधिकारिक ईमेल और व्हाट्सएप पर भी भेजी जानी चाहिए। इंडिया पोस्ट की बुकिंग रसीद और ऑनलाइन ट्रैकिंग रिपोर्ट (Delivery Confirmation) को सुरक्षित रखना अनिवार्य है।

यदि देनदार चेक बाउंस का नोटिस लेने से जानबूझकर इनकार कर दे तो क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय संविधान पीठ ने सी.सी. अलवी हाजी बनाम पालापेटी मुहम्मद (2007) 6 SCC 555 में फैसला दिया है कि यदि नोटिस सही पते पर स्पीड पोस्ट से भेजा गया है और देनदार उसे लेने से मना करता है ('Refused' या 'Unclaimed' या 'Door Locked'), तो जनरल क्लॉजेज एक्ट की धारा 27 के तहत इसे वैधानिक रूप से 'तामील' (Deemed Service) माना जाएगा। डाक विभाग की वापसी रिपोर्ट के साथ आप सीधे मजिस्ट्रेट कोर्ट में केस दर्ज कर सकते हैं।

15 दिन का नोटिस बीत जाने के बाद कोर्ट में केस करने की क्या समय सीमा है?

15 दिन की वैधानिक भुगतान अवधि समाप्त होने के ठीक अगले दिन से 'कार्रवाई का कारण' (Cause of Action) उत्पन्न होता है। एनआई एक्ट की धारा 142 के तहत, 15 दिन समाप्त होने के बाद अगले 30 दिनों के भीतर न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) या मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट (MM) की अदालत में लिखित आपराधिक परिवाद (Complaint) दायर करना अनिवार्य होता है।

चेक बाउंस नोटिस तैयार करवाने और भेजने का क्या खर्च (Charges) आता है?

सामान्यतः स्थानीय वकील चेक बाउंस नोटिस ड्राफ्ट करने के लिए ₹2,500 से ₹10,000 तक शुल्क लेते हैं। LegalRecovery.in पर विशेषज्ञ अधिवक्ताओं द्वारा वैधानिक धारा 138 नोटिस की ड्राफ्टिंग, स्पीड पोस्ट डिस्पैच और ट्रैकिंग मात्र ₹999 (फ्लैट सरकारी दर) में 24 घंटे के भीतर पूरी की जाती है, जिसमें कोई छिपा हुआ शुल्क नहीं होता।

प्राथमिक कानूनी संदर्भ और आधिकारिक स्रोत (Primary Statutory Sources)

यह प्रारूप एवं कानूनी मार्गदर्शन भारत के केंद्रीय अधिनियमों और सर्वोच्च न्यायालय के प्रकाशित निर्णयों पर आधारित है:

अंतिम वैधानिक अद्यतन: 4 नवम्बर 2026 • LegalRecovery.in विधिक अनुसंधान प्रभाग

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